घर का सामन खत्म हो गया था
भूलने की बीमारी तो पुरानी थी ही
सोचा एक फ़ेहरिस्त बना लूँ....
पुराने कागज़ों के ढेर से
अनमने में एक कागज़ उठाया
और आज की तारीख लिखी, लिखा -
१. बैंक का फिक्स्ड डिपाजिट तुड़वाना
२. बेसन
३. ज़ीरा
४. हरी सब्ज़ियाँ / फल
लिखते हुए लगा की पन्ना जाना हुआ है
पीछे की लिखावट पहचानी हुई है
शायद उस बिसरे शायर की है
जो उन पन्नो में कब का दफ़न हो चुका है
लफ्ज़ काफ़ूर हो चले थे
मायने तो कब के मिट चुके थे
पर अब भी उसपे तुम्हारा नाम
उभर उभर के जता रहा है
बता रहा है, पन्नो में दफ़न शायर को
वो सब बेकार था, बेमायने था, ग़ुबार था.
ढूंढते फ़िर रहे हैं, अब भी उस ख़ुदा को
मिलेगा शायद ज़न्नत या दोज़ख में पड़ा हुआ ।
भूलने की बीमारी तो पुरानी थी ही
सोचा एक फ़ेहरिस्त बना लूँ....
पुराने कागज़ों के ढेर से
अनमने में एक कागज़ उठाया
और आज की तारीख लिखी, लिखा -
१. बैंक का फिक्स्ड डिपाजिट तुड़वाना
२. बेसन
३. ज़ीरा
४. हरी सब्ज़ियाँ / फल
लिखते हुए लगा की पन्ना जाना हुआ है
पीछे की लिखावट पहचानी हुई है
शायद उस बिसरे शायर की है
जो उन पन्नो में कब का दफ़न हो चुका है
लफ्ज़ काफ़ूर हो चले थे
मायने तो कब के मिट चुके थे
पर अब भी उसपे तुम्हारा नाम
उभर उभर के जता रहा है
बता रहा है, पन्नो में दफ़न शायर को
वो सब बेकार था, बेमायने था, ग़ुबार था.
ढूंढते फ़िर रहे हैं, अब भी उस ख़ुदा को
मिलेगा शायद ज़न्नत या दोज़ख में पड़ा हुआ ।