वो ज़मीन मेरी नहीं थी
वो दरख़्त भी मेरे नहीं थे
अंजीर का क्षत विक्षत पड़ा हुआ वो पेड़ भी नहीं
जो बाहें फैलाता था , तो फलक आगोश में आ जाता था
चाय के प्यालों का हमदम सा बन गया था वो...
वो ज़मीन मेरी नहीं थी
वो अंजीर का पेड़ भी मेरा नहीं था
न था वो, उन कोयलों औ गिलहरियों का
न उन चुन चुन गाती चिड़ियों का
न उन बारिशों का , जो पत्तों पे टिप् टिप्पर कर गुनगुनाती थीं
न सर सर बहती उसमें मदहोश हवाओं का
न रेशम सी रौशनी वाली सहर का
न चांदनी में धुली उन रातों का
लेकिन एक कायनात सी रच बस गयी थी हम सब की ,
उस दरख़्त की विशाल शाखाओं में
वो ज़मीन थी उसकी, जिसके नाम खींची हुई वो लकीरें थी
थी उसके नाम, जो गिन गया होगा अशर्फियाँ अपनी
मेरा, उस अंजीर के पेड़ का, उन गिलहरियों,
उन बुलबुलों, और उन चुन-चुन गाती चिड़ियों का...
कुछ नहीं था...
मांगी हुई कायनात पे रश्क करने का भी हक़ नहीं शायद
पर आहें और बद दुआ हमारी सरहदों में है
लुटे हुओं का, पिटे हुओं का इस पे हक़ ज़्यादा है शायद
तो ये लो आदम.... झेल सको तो झेल लो...
एक दिन बरसेगा विनाश का कहर आदम तुम पर
गिन लो आहों-बद दुआओं में अपने, एक और बद दुआ अब....
उस अंजीर के पेड़ का, जो चाय के प्यालों पर मेरा हमदम सा बन गया था...
- पुष्कर गुंजन (२५/०२/२०१६, १८:५२ #PrestigeKewGardens)
वो दरख़्त भी मेरे नहीं थे
अंजीर का क्षत विक्षत पड़ा हुआ वो पेड़ भी नहीं
जो बाहें फैलाता था , तो फलक आगोश में आ जाता था
चाय के प्यालों का हमदम सा बन गया था वो...
वो ज़मीन मेरी नहीं थी
वो अंजीर का पेड़ भी मेरा नहीं था
न था वो, उन कोयलों औ गिलहरियों का
न उन चुन चुन गाती चिड़ियों का
न उन बारिशों का , जो पत्तों पे टिप् टिप्पर कर गुनगुनाती थीं
न सर सर बहती उसमें मदहोश हवाओं का
न रेशम सी रौशनी वाली सहर का
न चांदनी में धुली उन रातों का
लेकिन एक कायनात सी रच बस गयी थी हम सब की ,
उस दरख़्त की विशाल शाखाओं में
वो ज़मीन थी उसकी, जिसके नाम खींची हुई वो लकीरें थी
थी उसके नाम, जो गिन गया होगा अशर्फियाँ अपनी
मेरा, उस अंजीर के पेड़ का, उन गिलहरियों,
उन बुलबुलों, और उन चुन-चुन गाती चिड़ियों का...
कुछ नहीं था...
मांगी हुई कायनात पे रश्क करने का भी हक़ नहीं शायद
पर आहें और बद दुआ हमारी सरहदों में है
लुटे हुओं का, पिटे हुओं का इस पे हक़ ज़्यादा है शायद
तो ये लो आदम.... झेल सको तो झेल लो...
एक दिन बरसेगा विनाश का कहर आदम तुम पर
गिन लो आहों-बद दुआओं में अपने, एक और बद दुआ अब....
उस अंजीर के पेड़ का, जो चाय के प्यालों पर मेरा हमदम सा बन गया था...
- पुष्कर गुंजन (२५/०२/२०१६, १८:५२ #PrestigeKewGardens)