Thursday, February 25, 2016

वो अंजीर का एक पेड़

वो ज़मीन मेरी नहीं थी
वो दरख़्त भी मेरे नहीं थे
अंजीर का क्षत विक्षत पड़ा  हुआ वो  पेड़ भी नहीं
जो बाहें फैलाता था , तो फलक आगोश में आ जाता था

चाय के प्यालों का हमदम सा बन गया था वो...

वो ज़मीन मेरी नहीं थी
वो अंजीर का पेड़ भी मेरा नहीं था
न था वो, उन  कोयलों औ गिलहरियों का
न उन चुन चुन गाती चिड़ियों का
न उन बारिशों का , जो पत्तों पे टिप् टिप्पर कर गुनगुनाती थीं
न सर सर बहती उसमें मदहोश हवाओं का
न रेशम सी रौशनी वाली सहर का
न चांदनी में धुली उन रातों का
लेकिन एक कायनात सी रच बस गयी थी हम सब की ,
उस दरख़्त की विशाल शाखाओं में

वो ज़मीन थी उसकी, जिसके नाम खींची हुई वो लकीरें थी
थी उसके नाम, जो गिन गया होगा अशर्फियाँ अपनी
मेरा, उस अंजीर के पेड़ का, उन गिलहरियों,
उन बुलबुलों, और उन चुन-चुन गाती चिड़ियों का...
कुछ नहीं था...
मांगी हुई कायनात पे रश्क करने का भी हक़ नहीं शायद


पर आहें और बद दुआ हमारी सरहदों में है
लुटे  हुओं  का, पिटे  हुओं का इस पे हक़ ज़्यादा है  शायद
तो ये लो आदम.... झेल सको तो झेल  लो...

एक दिन बरसेगा विनाश का कहर आदम  तुम पर
गिन  लो आहों-बद दुआओं में  अपने, एक और बद दुआ अब....
उस अंजीर के पेड़ का, जो चाय के प्यालों  पर  मेरा हमदम सा बन गया था...

- पुष्कर गुंजन  (२५/०२/२०१६, १८:५२ #PrestigeKewGardens)

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