Sunday, September 8, 2013

गुज़रता वक़्त नहीं , गुज़रते तो हम हैं

गुज़रता वक़्त नहीं , गुज़रते तो हम हैं
वक़्त गुज़रता गया 
घडी की करारी टिक-टिकी लम्हों के मुखोटे पेहेन
सांसें भी दम भर रही हैं 
सुबहों के उजाले और शामों के साए के साथ 
गुच्छों मैं खिलता हुआ ये 
मुरझाता है हमारे साथ.
सांस लेता ये वक़्त , गुज़रता हुआ ये वक़्त
सूखे गुलदस्तों सा बिखरा हुआ उन राहों पर
जिनसे वो गुज़र चुका 
क्षोभ हो अगर तुम्हें कभी कि वक़्त गुज़र गया 
तो सुनो , उलटी दिशा मैं पलट के वो कह रहा 
गुज़र  मैं नहीं रहा  , गुज़र तुम रहे हो. 
क्षण, मिनुटें , घंटे, दिन 
हफ्ते , महीने, साल और सदियाँ 
पलक झपकते गुज़र गए,
किस्सों से भरे हमारे ग्रन्थ 
वक़्त ठहरा रहा, एक संत्री सा … 
निर्भाव, देखता हुआ, शायद सत्य कहता हुआ 
गुज़रता वक़्त नहीं, गुज़रते तो हम हैं 
-  पुष्कर गुँजन 

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