Sunday, December 22, 2013

खाये जाओ खिलाये जाओ

मूक बड़े मित्र हैं
इन लोमड़ियों और भेडिओं के
उन से भी बड़े मित्र हैं वो
वो मूढ़ बुद्धिजीवी, जो कहते हैं
कुछ हुआ है होगा।

सब सम्मिलित स्वर में बोलो

खाये जाओ खिलाये जाओ
सौ खाओ, हज़ार खाओ, लाख खाओ
खाओ करोड़, हज़ार करोड़ खाओ
खाओ संख, महा संख, डपोर संख खाओ
ब्रह्माण्ड खाओ - खाये जाओ, खिलाये जाओ.
&#&$$#$*(^*^%&%$


कर देने वाला और कर से कर्म वाला
आज मूर्ख बने हैं सब के सब
उतार देने को कमीज़ और पतलून
खड़ा है तैयार , ITR की कतार में।

सब सम्मिलित स्वर में बोलो

खाये जाओ खिलाये जाओ
सौ खाओ, हज़ार खाओ, लाख खाओ
खाओ करोड़, हज़ार करोड़ खाओ
खाओ संख, महा संख, डपोर संख खाओ
ब्रह्माण्ड खाओ - खाये जाओ, खिलाये जाओ.
&#&$$#$*(^*^%&%$

कुछ अलग ध्वनि उठी हैं,उठने दो उन्हें।
"कुछ हुआ है होगा" , कहो.
रगों को भी समय लगता है
सुरों और तालों के संगम में

आओ सब सम्मिलित स्वर में गायें और गाने दें.…
ना खाने देंगे , खिलाने देंगे।

ना खाओ, ना खिलाओ।

No comments:

Post a Comment