मूक बड़े मित्र हैं
इन लोमड़ियों और भेडिओं के
उन से भी बड़े मित्र हैं वो
वो मूढ़ बुद्धिजीवी, जो कहते हैं
कुछ न हुआ है न होगा।
सब सम्मिलित स्वर में बोलो …
खाये जाओ खिलाये जाओ
सौ खाओ, हज़ार खाओ, लाख खाओ
खाओ करोड़, हज़ार करोड़ खाओ
खाओ संख, महा संख, डपोर संख खाओ
ब्रह्माण्ड खाओ - खाये जाओ, खिलाये जाओ.
&#&$$#$*(^*^%&%$
कर देने वाला और कर से कर्म वाला
आज मूर्ख बने हैं सब के सब
उतार देने को कमीज़ और पतलून
खड़ा है तैयार , ITR की कतार में।
सब सम्मिलित स्वर में बोलो …
खाये जाओ खिलाये जाओ
सौ खाओ, हज़ार खाओ, लाख खाओ
खाओ करोड़, हज़ार करोड़ खाओ
खाओ संख, महा संख, डपोर संख खाओ
ब्रह्माण्ड खाओ - खाये जाओ, खिलाये जाओ.
&#&$$#$*(^*^%&%$
कुछ अलग ध्वनि उठी हैं,उठने दो उन्हें।
"कुछ न हुआ है न होगा" , न कहो.
रगों को भी समय लगता है
सुरों और तालों के संगम में
आओ सब सम्मिलित स्वर में गायें और गाने दें.…
ना खाने देंगे , न खिलाने देंगे।
ना खाओ, ना खिलाओ।
No comments:
Post a Comment