Saturday, October 1, 2016

कुछ ख़्वाब, देर से पकते हैं...

कुछ ख़्वाब देर से पकते हैं,
बरसों सांचे में ढलते हैं |

सदियों की नींद उड़ाते हैं
कभी कभी तो वालिदों के ख्व़ाब,
बच्चों के पर बन कर निकलते हैं
या फिर कभी उनके नाम बन कर
समय पर एक हर्फ़ बन कर रह जाते हैं |

कुछ ख़्वाब देर से पकते हैं,
बरसों सांचे में ढलते हैं |

ग़ुमनाम ख़्वाबो का होता नहीं है अच्छा मंज़र
जैसे बिखरे हुए, नर कंकाल अस्थि पंजर
जैसे मरू में सूखे सराबों-दरिये,
देखते हैं ख़्वाब हर पल...
कि मिल जाएँ बादलों, बूंदों, बारिशों में,
पर ज़रूरी नहीं  कि हर चाह हो मुक़म्ममल |

कुछ ख़्वाब देर से पकते हैं,
बरसों साँचे में ढलते हैं |

तो साध लो साँसें अपनी,
त्यज दो बेचैन आसें अपनी,
शर्त रखो कि वो पूरी हों
बस नाजों से रखो, पलकों पर उन्हें
दो उन्हें, जो वो चाहें तुमसे,
खून, पसीना, धैर्य और असीमित वक़्त |

क्योंकि कुछ ख्व़ाब देर से पकते हैं,
तभी सांचों में ढलते हैं |

-  गुंजन

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